गाय : एक परिचय
गाय को संस्कृत में धेनु नाम से जाना जाता है। अन्य भाषाओं में इसे अंग्रेजी में cow स्पेनिश में vaca फ्रेंच में vache जर्मन में Kuh इटालियन में mucca पुर्तगाली में vaca डच भाषा में koe रशियन में корова (korova) चीनी या मंडारिन भाषा में 牛 (niú) जापानी में 牛 (ushi) कोरियन में 소 (so) अरबी में بقرة )baqara) आदि नाम से पुकारा जाता है। गाय का वैज्ञानिक नाम Bos taurus है । गाय का उल्लेख सनातन संस्कृति के विभिन्न ग्रंथो में ही नहीं अपितु अन्य धर्म ग्रंथों में भी पाया जाता है। गाय का केवल धार्मिक या आध्यात्मिक महत्त्व ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी काफी महत्त्व रहा है तथा इसके आर्थिक महत्त्व से भारत सहित विश्व के सभी कृषिप्रधान रहे देश लाभान्वित रहे हैं। गाय सामजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक लम्बे समय से रही है तथा गाय के मनोवैज्ञानिक प्रभाव एवं चिकित्सीय महत्त्व से सभी चिरपरिचित हैं। गाय में मादा प्राणी यानि गाय की सामान्य रूप से ऊँचाई 4 फीट लगभग वजन करीब 400-600 किलो तथा नर प्राणी यानि सांड की उंचाई करीब 4-4.5 फीट लगभग तथा वजन 800-1200 किलो तक होता है, विदेशी नस्लों की उंचाई व वजन देशी नस्लों की तुलना में ज्यादा होता है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीपीय पर्यावरण में देशी नस्ल स्वाभाविक रूप से अधिक सामंजस्य बिठा सकती हैं। स्वभाव से गाय शांत प्रकृति की, घरेलु वातावरण में अनुकूलता से रहने में सक्षम, पालतू श्रेणी का प्राणी है जिसका भोजन शाकाहार है एवं घास की अधिकतर किस्में गीले व सूखे रूप में इसका मुख्य भोजन है। पालतू गायों को गौपालक विभिन्न पशु आहार एवं अन्य पदार्थ भी देते हैं।
गाय की करीब 50 के लगभग देशी नस्लें भारत में पाई जाती है जिनमें सभी की अपनी अपनी खूबियाँ हैं जैसे कुछ का दूध उत्पादन अधिक है तो कुछ में भार वहन की क्षमता अधिक है एवं कुछ में दोनों गुण हैं तो कुछ नस्लें शुष्क जलवायु में भी सफलतापूर्वक पाली जा सकने वाली हैं। पशुधन गणना के वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार भारत में गाय की संख्या 192.5 मिलियन यानी 19 करोड़ 25 लाख लगभग गौवंश भारत में उस समय था जिनकी संख्या 2012 से 2019 के बीच 0.8 प्रतिशत बढ़ी थी एवं 2019 से अब तक भी बढ़ने की ही आशा है। भारत में 2019-20 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 406 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन रही है जिनमे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में ये औसत काफी अच्छा रहा है। वर्ष 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार देश की जीडीपी में कृषि और सम्बद्ध एवं पशुधन क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन में हिस्सा 1,84,61,343 करोड़ रूपये रहा जिसमे 33,94,033 करोड़ रूपये कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र का रहा तथा 9,62,682 करोड़ रूपये पशु सम्बद्ध क्षेत्र का रहा है। सनातनी व हिन्दू गाय को 'माता' (गौमाता) कहते हैं। उनमें यह विश्वास है कि गाय देवत्व और प्राकृतिक कृपा की प्रतिनिधि है, और इसलिए इसकी रक्षा तथा पूजा की जानी चाहिए। हिन्दू धर्म में गाय की पूजा का मूल आरंभिक वैदिक काल में खोजा जा सकता है। भारोपीय लोग, जैसे महाभारत व मनुस्मृति के हिस्सों में और ऋग्वेद में दुधारू गाय को पहले से ही 'अवध्या' कहा गया था
गाय की पूज्यता का संकेत उपचार शुद्धिकरण और प्रायश्चित के संस्कारों में पंचगव्य, गाय के पांच उत्पादन, दूध, दही, मक्खन, मूत्र और गोबर के प्रयोग से मिलता है। बाद में गायअहिंसा के आदर्श के उदय के साथ गाय अहिंसक उदारता के जीवन का प्रतीक बन गई। साथ ही इस तथ्य के आधार पर कि उसके उत्पादन पोषण प्रदान करते हैं। गाय को मातृत्व और धरती माँ से भी संबद्ध किया गया। ईसा की पहली शताब्दी के मध्य में गुप्त राजाओं द्वारा गाय की हत्या करने पर मृत्युदंड का प्रावधान किया गया। हिन्दू संस्कृति के अनुसार जिस घर में गाय निवास करती हैं एवं जहाँ गौ सेवा होती है, उस घर से समस्त समस्याएँ कोसों दूर रहती हैं। भारतीय संस्कृतिके अनुसार गाय को अपनी माता के समान सम्मान दिया जाता हैं इस लिये गाय को गौ-माता कहकर पुकारते है। गाय का विशिष्ट संबंध कई देवताओं, विशेषकर शिव जिनका वाहन बैल है। इन्द्र मनोकामना पूर्ण करने वाली गाय कामधेनु से संबद्ध, कृष्ण अपनी युवावस्था में एक ग्वाले और सामान्य रूप से देवियों के साथ उनमें से कई के मातृवत गुणों के कारण जोड़ा जाता है। गाय के मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया व यूरिक एसिड आदि होता है। गाय का दूध कम फैट वाला एवं शक्तिशाली होता है, उसे पीने से मोटापा नहीं बढ़ता तथा स्त्रियों के प्रदर रोग आदि में लाभ होता है। गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं तथा दुर्गंध का नाश होता है। गाय के इन्हीं महत्वपूर्ण गुणों को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय डेयरी कांग्रेस ने गाय पर डाक टिकट भी जारी किया था
गौवंश संबंधित रोग, उपचार एवं अस्पताल
गौवंश सहित अन्य पशुओं में संक्रामक रोगों में कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनका कोई उपचार नहीं होता है। ऐसी स्थिति में उपचार से बचाव ही अच्छा और उचित रास्ता होता हैं। संक्रामक रोगों से पीड़ित पशु की चिकित्सा भी अत्यंत मंहगी होती है। उपचार के लिए पशु को चिकित्सा भी कई बार आसानी से नहीं मिल पाती है। इन रोगों से पीड़ित पशु को यदि उपचार कराने से जीवित बच भी जाते हैं। तो भी उनके उस ब्यात के दूध की मात्रा में अत्यंत कमी हो जाती है। जिससे पशुपालकों को अधिक आर्थिक हानि होती है। संक्रामक रोगों के रोकथाम के लिए आवश्यक है कि पशुओं में रोग रोधक टीके निर्धारित समय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष लगवाए जाएँ तभी इन बीमारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। संक्रामक रोग - छूत की बीमारी एक मवेशी से अनेक मवेशियों में फैल जाती हैं। किसानों को इस बात का अनुभव है कि ये छूत की बीमारी आमतौर पर महामारी का रूप ले लेती है। संक्रामक रोग प्रायः विषाणुओं द्वारा फैलाये जाते हैं। लेकिन अलग अलग रोग में इनके प्रसार के रास्ते अलग - अलग होते हैं। उदहारणतः खुरहा रोग के विषाणु बीमार पशु की लार से गिरते रहते हैं। तथा पानी में घुस कर उसे दूषित बना देते हैं। इस पानी के जरिए अनेक पशु इसके शिकार हो जाते हैं। अन्य संक्रामक रोग के जीवाणु भी पानी, चमड़े या छींक से गिरने वाले पानी के द्वारा एक पशु से अनेक पशुओं को रोग ग्रस्त बनाते हैं। इसलिए यदि गांव या पड़ोस के गाँव में कोई संक्रामक रोग फ़ैल जाए तो मवेशियों के बचाव के लिए निम्नाकिंत उपाय कारगर होते हैं-
• सबसे पहले रोग के फैलने की सूचना अपने पशुधन सहायक या ब्लॉक (प्रखंड) के पशुपालन पदाधिकारी को देनी चाहिए। वे इसके रोकथाम का इंतजाम तुरंत करते हुए बचाव के उपय भी बता सकते हैं।
• अगर पड़ोस के गाँव में बीमारी फैली हो तो उस गाँव से मवेशियों या पशुपालकों का आना जाना बंद कर देना चाहिए।
• सार्वजनिक तालाब या आहार में मवेशियों को पानी पिलाना बंद कर देना चाहिए।
• इस रोग के पशुओं को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए।
• संक्रामक रोग से मरे हुए पशुओं को यहां वहां नहीं फेकना चाहिए। ऐसे मृत पशुओं का दाहसंस्कार कर देना चाहिए। या 5-6 फुट गड्डा खोद कर चूना के साथ गाड़ (विधिपूर्वक) देना चाहिए।
• जिस स्थान पर बीमार पशु को रखा गया हो या मरा हो उस स्थान को फिनाइल के घोल से अच्छी तरह धो देना चाहिए। या साफ सुथरा वहाँ चूना छिड़क देना चाहिए। ताकि रोग के जीवाणु या विषाणु मर जाएँ|
पशुओं के प्रमुख रोग - रोकथाम एवं उपचार
1. खुरपका - मुहंपका रोग (फुट एंड माउथ डिजीज)
2. गलघोंटू (एच. एस)
3. गिल्टी रोग (एंथ्रेक्स)
4. लंगड़िया रोग (ब्लैक क्वार्टर)
5. रिंडरपेस्ट (पशु प्लेग)
6. चेचक या माता
7. पशु - यक्ष्मा (टी. बी.)
8. थनैल
1. खुरपका - मुहंपका रोग (फुट एंड माउथ डिजीज)
यह एक विषाणुओं से फैलने वाला संक्रामक रोग है। जो कि सभी जुगाली करने वाले पशुओं में होता है। यह रोग गाय, भैंस, भेंड, बकरी, सुअर आरी पशुओं को पूरे वर्ष कभी भी हो सकता है। संकर गायों में यह बीमारी ज्यादा फैलती है। इस रोग से पीड़ित पशु के पैर से खुर तक तथा मुंह में छालों का होना, पशु का लंगडाना व मुहं से लगातार लार टपकाना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण होते हैं। यह एक प्राणघातक रोग भी है। रोगी पशु की सामायिक चिकित्सा न करने से उसकी मृत्यु भी हो सकती है। इस रोग से बचाव के लिए प्रत्येक छः माह के अन्तराल पर पशु का टीकाकरण करवाना चाहिए तथा पशु में रोग फैलने की स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए|
2. गलघोंटू (एच. एस)
यह बीमारी गाय भैंस को ज्यादा परेशान करती है। भेड़ तथा सुअरों को भी यह बीमारी लग जाती है। इसका प्रकोप ज्यादातर बरसात में होता है।
लक्षण - शरीर का तापमान बढ़ जाता है। और पशु सुस्त हो जाता है। रोगी पशु का गला सूज जाता है। जिससे खाना निगलने में कठिनाई होती है। इसलिए पशु खाना पीना छोड़ देता है। पशु को साँस लेने में भी काफ़ी तकलीफ होती है। किसी किसी पशु को कब्ज़ की भी परेशानी हो जाती हैं। और उसके बाद दस्त भी होने लगते है। बीमार पशु 6 से 24 घंटे के भीतर मर जाता है। पशु के मुंह से लार गिरती है।
चिकित्सा - संक्रामक रोग से बचाव और उनकी रोग -थाम के सभी तरीके अपनाना आवश्यक है। और रोगी पशु का तरंत इलाज कराएं। बरसात के पहले ही निरोधक का टिका लगवा कर मवेशी को सुरक्षित कर लेना लाभदायक है। इसके मुफ्त टीकाकरण की व्यवस्था विभाग द्वारा की गई है|
3. गिल्टी रोग (एंथ्रेक्स)
यह एक बहुत ही भयंकर जीवाणुओं से फैलने वाला रोग है। गांवों में इस घातक रोग को गिल्टी रोग के अतिरिक्त जहरी बुखार, प्लीहा बुखार. बाघी आदि नामों से भी जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे एंथ्रेक्स कहते है। यह बैसिलस एंथ्रेक्स नाम जीवाणु से फैलता है। यह बीमारी गाय - भैंस, भेड़ बकरी, घोड़ा आदि में होती है। स्वस्थ पशुओं में यह रोग रोगी पशु के दाने चारे बाल - ऊन, चमड़ा, श्वांस तथा घाव के माध्यम से फैलता है।
इस रोग में पशु के जीवित बचने की संभावना बहुत कम रहती है। यह रोग गाय भैंस के अलावा बैलों में भी फैलता है। इस रोग के जीवाणु चारे पानी तथा घाव के रास्ते पशु के शरीर में प्रवेश करते है। और शीघ्र ही खून (रक्त) के अंदर फैलता है। और रक्त को दूषित कर देता हैं। उक्त के नष्ट होने पर पशु मर जाता है। रोग के जीवाणु पशु के पेशाब, गोबर तथा रक्तस्त्राव के साथ शरीर से बाहर निकलकर खाने वाले चारे को दूषित कर देते है। जिससे अन्य स्वस्थ पशुओं में भी यह रोग लग जाता है। अतः इन रोगी पशुओं को गांव के बाहर खेत में रखना चाहिए। रोग का गंभीर रूप आने पर पशु के मुहं, नक्, कान, गुदा तथा योनि से खून बहना प्रारंभ हो जाता है। रोगी पशु कराहता है। व पैर पटकता है। बीमारी की इस स्थिति में आने पर पशु मर सकता है। यह ध्यान रहे कि रोगी पशु को बीमार होने पर कभी भी टीका नहीं लगवाना चाहिए|
4. लंगड़िया रोग (ब्लैक क्वार्टर)
इस बीमारी को अलग अलग क्षेत्र में लंगड़ी, सुजका, जहरवाद आदि नामों से भी जाना जाता है। यह गाय एवं भैंस की छूत की बीमारी है। यह बीमारी बरसात में अधिकतर फैलती है। स्वस्थ पशु में यह बीमारी रोगी पशु के चारे - दाने या पशु के घाव द्वारा फैलती है।
पशु में अचानक तेज बुखार आना. पैरों में लंगड़ाहट उसमें सूजन आना, भूख न लगना, कब्ज होना, खाल के नीचे कहीं - कहीं चर - की आवाज होना तथा दूध का फटना आदि इस बीमारी के प्रमुख लक्षण है। इस से बचाव के लिए वैक्सीन के टीके प्रतिवर्ष लगवाना चाहिए। बछड़े तथा बछियों को छः माह की आयु में वर्षा ऋतु से पूर्व ही टीका लगवा देना चाहिए। यह टीका 3 वर्ष की आयु तक ही लगाया जाता है। रोग के लक्षण प्रकट होते ही पशु चिकित्सक की सहायता ली जानी चाहिए|
5. रिंडरपेस्ट (पशु प्लेग)
यह बीमारी पोकानी, पकावेदन, पाकनीमानता, वेदन आदि नामों से गांव में जानी जाती है। यह रोग सभी जुगाली करने वाले पशुओं में होता है। इस रोग में तेज बुखार, भूख न लगना, दुग्ध उत्पादन में कमी होना, जीभ के नीचे तथा मसूड़ों पर छालों का पड़ना आदि प्रमुख लक्षण होते है। इस रोग में पशु की आंखे लाल हो जाती है। तथा उनमें गाढ़े पीले रंग का कीचड़ बहने लगता है। खून से मिले पतले दस्त तथा कभी - कभी नाक तथा योनि द्वार पर छाले भी पड़ जाते हैं। रिंडरपेस्ट एक प्रकार का विषाणुजनित (वायरस) रोग है। यदि किसी पशु में इस रोग के लक्षण दिखाई देते है। तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं का सामयिक टीकाकरण कराना अति आवश्यक होता है|
6. चेचक या माता
यह भी विषाणुओं से फैलने वाला एक संक्रामक रोग है। जो आमतौर से गायों तथा उसकी संतान में होता है। कभी कभी गायों के साथ साथ भैंसों में भी यह रोग देखा गया है। इस रोग में पशु की मृत्यु दर तो कम होती है। परंतु पशु की कार्यक्षमता एवं दुग्ध उत्पादन में अत्यधिक कमी आती है। यह रोग भी आमतौर से एक पशु से दुसरे पशु को लगता है। दूध दूहने वाले ग्वालों द्वारा भी यह रोग एक गाँव से दुसरे गाँव में फैलता है। इस रोग से बचाव हेतु वर्ष में एक बार नवम्बर - दिसम्बर माह में टिका अवश्य लगवाना चाहिए|
7. पशु - यक्ष्मा (टी. बी.)
मनुष्य के स्वस्थ्य के रक्षा के लिए भी इस रोग से काफी सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि यह रोग पशुओं का संसर्ग में रहने वाले या दूध इस्तेमाल करने वाले मनुष्य को भी अपने चपेट में ले सकता है।
लक्षण - पशु कमजोर और सुस्त हो जाता है। कभी - कभी नाक से खून निकलता है। सूखी खाँसी भी हो सकती है। खाने के रुचि कम हो जाती है। तथा उसके फेफड़ों में सूजन हो जाती है।
चिकित्सा - संक्रामक रोगों से बचाव का प्रबंध करना चाहिए। संदेह होने पर पशु जाँच कराने के बाद
एकदम अलग रखने का इंतजाम करें। बीमार मवेशी को यथाशीघ्र गो - सदन में भेज देना ही उचित है। क्योंकी यह एक असाध्य रोग है|
8. थनैल
दुधारू मवेशियों को यह रोग दो कारणों से होता है। पहला कारण है थन पर चोट लगना या थन का काट जाना
संक्रामक जीवाणु थन में प्रवेश कर जाते हैं। पशु को गंदे दलदली स्थान पर बांधने तथा दूहने वाले की असावधानी के कारण थन में जीवाणु प्रवेश क्र जाते हैं। अनियमित रूप से दूध दूहना भी थनैल रोग को निमंत्रण देना है। साधारणतः अधिक दूध देने वाली गाय शिकार बनती है। भैंस इसका
लक्षण थन गर्म और लाल हो जाना, उसमें सूजन होना, शरीर का तापमान बढ़ जाना, भूख न लगना, दूध का उत्पादन कम हो जाना, दूध का रंग बदल जाना तथा दूध में जमावट हो जाना इस रोग के खास लक्षण हैं।
चिकित्सा पशु को हल्का और सुपाच्य आहार देना चाहिए। सूजे स्थान को सेंकना चाहिए। पशूचिकित्सक की राय से एंटीवायोटिक दवा या मलहम का इस्तेमाल करना चाहिए। थनैल से आक्रांत मवेशी को सबसे अंत में दुहना चाहिए।
गायों में होने वाले सामान्य रोग
संक्रामक रोगों के अलावा बहुत सारे साधारण रोग भी हैं-
जो पशुओं की उत्पादन क्षमता कम कर देते है। ये रोग ज्यादा भयानक नहीं होते, लेकिन समय पर इलाज नहीं कराने पर काफी खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। सामान्य बीमारियों के लक्षण और प्राथमिक चिकित्सा।
1. अफरा
हरा और रसीला चारा, भींगा चारा या दलहनी चारा अधिक मात्रा में खा लेने के कारण पशु को अफरा की बीमारी हो जाती है। खासकर, रसदार चारा जल्दी जल्दी खाकर अधिक मात्रा में पीने से यह बीमारी पैदा होती है। बाछा-
बाछी को ज्यादा दूध पी लेने के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। पाचन शक्ति कमजोर हो जाने पर मवेशी को इस बीमारी से ग्रसित होने की आशंका अधिक होती है।
लक्षण
इस रोग में पशुओं का पेट फूल जाता है। ज्यादातर रोगी पशु का बायाँ पेट पहले फूलता है। पेट को थपथपाने पर ढोल की तरह (दप ढप) की आवाज निकलती है। पशु कराहने लगता है।पशु को साँस लेने में तकलीफ होती है। रोग बढ़ जाने पर पशु चारा और दाना खाना छोड़ देता है। और बेचैनी बढ़ जाती है। रोग के अत्यधिक तीव्र अवस्था में पशु बार-बार लेटता और खड़ा होता है।
पशु कभी कभी जीभ बाहर लटकाकर हांफता हुआ नजर आता है। और पीछे के पैरों को बार-बार पटकता है।
चिकित्सा
पशु के बाएं पेट पर दबाव डालकर मालिश करनी चाहिए। पशु के ऊपर ठंडा पानी डालें और तारपीन का तेल
पकाकर लगाएँ। मुहं को खुला रखने का इंतजाम करें। इसके लिए जीभी को मुंह से बाहर निकालकर जबड़ों के बीज
कोई साफ और चिकनी लकड़ी रखें। रोग की प्रारंभिक अवस्था में पशु को इधर उधर घुमाने से भी फायदा होता है।
पशु को पशुचिकित्सक से परामर्श लेकर तारपीन का तेल आधा से एक छटाक, छः छटाक टीसी के तेल में मिलाकर पिलाया जा सकता है। उसके बाद दो सौ ग्राम मैगसल्फ़ और दो सौ ग्राम नमक एक
बड़ी बोतल में पानी में मिलाकर जुलाब देना
चाहिए।
पशु को लकड़ी के कोयले का चूरा, आम का पुराना आचार, काला नमक, अदरख, हिंग और सरसों जैसी चीज पशुचिकित्सक के परामर्श से खिलायी जा सकती है।
पशु को स्वस्थ होने पर थोड़ा थोड़ा पानी दिया जा सकता है। लेकिन किसी प्रकार का चारा नहीं खिलाया जा सकता है।
2. दुग्ध - ज्वर
दुधारू गाय भैंस या बकरी इस रोग के चपेट में पड़ती है। ज्यादा दुधारू पशु को ही यह बीमारी अपना शिकार बनाती है। बच्चा देने के 24 घंटे के अदंर दुग्ध ज्वर के लक्षण साधारणतया दिखेते हैं।
लक्षण
पशु बेचैन हो जाता है। पशु कांपने और लड़खड़ाने लगता है। मांसपेसियों में कंपन होने लगती हैं। जिसके कारण पशु खड़ा रहने में असमर्थ रहता है। मुंह सूख जाता है। पलके झुकी झुकी और आंखे
निस्तेज सी दिखाई देती है।
पशु सीने के सहारे जमीन पर बैठता है। गर्दन और शरीर को एक ओर मोड़ लेता है। ज्यादातर पीड़ित पशु इसी अवस्था में देखे जाते हैं। तीव्र अवस्था में पशु बेहोश हो जाता है और गिर जाता है। चिकित्सा नहीं करने पर कोई-कोई पशु 24 घंटे के अंदर मर भी जाता है।
चिकित्सा
थन को गीले कपड़े से पोंछ कर उसमें साफ कपड़ा इस प्रकार बांध दें कि उसमें मिट्टी न लगे। ठीक होने के बाद 2-3 दिनों तक थन को पूरी तरह
खाली नहीं करें।
पशु को जल्दी और आसानी से पचने वाली खुराक दें।
3. दस्त और मरोड़
इस रोग के दो कारण हैं अचानक ठंडा लग जाना और पेट में किटाणुओं का होना। इसमें आंत में सुजन हो जाती है।
लक्षण
पशु को पतले और पानी जैसे दस्त होते है।
पेट में मरोड़ होती है। आंव के साथ खून गिरता है।
चिकित्सा
ऐसे में आसानी से पचने वाला आहार जैसे माड़, उबला हुआ दूध, बेल का गुदा आदि खिलाना चाहिए।
चारा पानी कम देना चाहिए।
बाछा बाछी को कम दूध पीने देना चाहिए।
4. निमोनिया
पानी में लगातार भींगते रहने या सर्दी के मौसम में खुले स्थान में बांधे जाने वाले मवेशी को निमोनिया रोग हो जाता है। अधिक बाल वाले पशुओं को यदि धोने के बाद ठीक से पोछा न जाए तो उन्हें भी यह रोग हो सकता है।
लक्षण
शरीर का तापमान बढ़ जाता है और सांस लेने में कठिनाई होती है। नाक से पानी बहता है और भूख भी कम लगती है। पैदावार घट जाती है और पशु भी कमजोर हो
जाता है।
चिकित्सा
बीमार मवेशी को साफ तथा गर्म स्थान पर रखना
चाहिए। उबलते पानी में तारपीन का तेल डालकर उससे उठने वाला भाप पशुओं को सूँघाने से फायदा होता है।
पशु के पांजर में सरसों के तेल में कपूर मिलकर मालिश करनी चाहिए।
घाव
पशुओं को घाव हो जाना आम बात है। चरने के लिए बाड़ा और कॉटों, झाड़ियों से काटकर अथवा किसी दुसरे प्रकार की चोट लग जाने से मवेशी को घाव हो जाता है। हल का फाल लग जाने से भी बैल को घाव हो जाता है। और किसानों की खेती बारी चौपट हो जाती है। बैल के कंधों पर पालों की रगड़ से भी सूजन और घाव हो जाता है।
चिकित्सा
सहने लायक गर्म पानी में लाल पोटाश या फिनाइल मिलाकर घाव की धुलाई करनी चाहिए। अगर घाव में कीड़े हो तो तारपीन के तेल में भिंगोई हुई पट्टी बांध देनी चाहिए।
मुंह के घाव को, फिटकरी के पानी से धोकर छोआ और बोरिक एसिड का घोल लगाने से फायदा होता है।
शरीर के घाव पर नारियल के तेल में भाग तारपीन का तेल और थोड़ा सी कपूर मिलाकर लगाना चाहिए
इस प्रकार बीमार गायों की देखभाल हेतु सभी पशु चिकित्सालयों में उचित सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई है तथा बहुत से सरकारी तथा निजी गोशालाएं जो कि बहुत से ट्रस्टों के द्वारा संचालित हैं उनमें भी गाय हेल्पलाइन के द्वारा बीमार गायों की सेवा की जाती है।
मनोवैज्ञानिक प्रभाव और महत्व
गाय एक शांत विनम्र और सकारात्मक प्राणी है, जिससे घर में शांति का वातावरण बनता है। वर्तमान में न केवल भारत में अपितु विदेशों में भी इसे अपनाया जा रहा है जैसे नीदरलैंड गाय को गले लगाने की परंपरा चल रही है। डच में "कोए नफ़ेलन " (शाब्दिक रूप से "गाय को गले लगाना") नाम से जाना जाने वाला यह अभ्यास एक अच्छे इंसान-से-जानवर के गले लगने के अंतर्निहित उपचार गुणों पर केंद्रित है। गाय को गले लगाने वाले आमतौर पर दो से तीन घंटे तक गायों में से किसी एक के साथ आराम करने से पहले खेत का दौरा करके शुरुआत करते हैं। गाय के शरीर का गर्म तापमान, धीमी धड़कन और विशाल आकार उन्हें गले लगाने को अविश्वसनीय रूप से सुखदायक अनुभव बना सकता है, और जानवर को पीठ पर मालिश करना, उनके साथ समय बिताना भी मनोवैज्ञानिक महत्व का है। माना जाता है कि गाय को गले लगाने से सकारात्मकता बढ़ती है और मनुष्यों में ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जो सामाजिक बंधन में स्रावित होने वाला हार्मोन है। ऐसा लगता है कि पालतू जानवर या भावनात्मक सहायता देने वाले जानवर के साथ लिपटने से मिलने वाला शांत प्रभाव, बड़े स्तनधारियों के साथ लिपटने पर और भी बढ़ जाता है।यह स्वस्थ शगल एक दशक से भी ज़्यादा पहले ग्रामीण डच प्रांतों में उभरा था, और अब यह लोगों को प्रकृति और ग्रामीण जीवन के करीब लाने के लिए एक व्यापक डच आंदोलन का हिस्सा है। आज, रॉटरडैम, स्विटज़रलैंड और यहाँ तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका के खेतों में गाय को गले लगाने के सत्र आयोजित किए जा रहे हैं और इस गतिविधि के आनंद-प्रेरक, तनाव-मुक्त करने वाले गुणों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
दुलार का यह अनुभव मवेशियों के लिए भी आनंददायक हो सकता है। एप्लाइड एनिमल बिहेवियर साइंस नामक पत्रिका में 2007 में किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि जब गायों की गर्दन और ऊपरी पीठ के विशेष क्षेत्रों में मालिश की जाती है, तो वे गहरी आराम की मुद्रा में आ जाती हैं, अपने कानों को पीछे की ओर खींचती हैं और उन्हें पीछे की ओर झुकाती हैं जो कि उनके द्वारा यह दर्शाना माना जाता है कि वे भी उस समय सुकून महसूस कर रही हैं जो कि किसी उन्हें दुलारने वाले के लिए भी शांति व सुकून का विषय होता है। भारत में तो प्राचीन काल से गाय को अपने परिवार का अभिन्न अंग माना जाता है गायों के बछड़ों के साथ घर के बच्चे खेलते हैं उनके साथ भोजन करते हैं यहाँ तक कि गले लगाकर ही बच्चे सो जाते है जिससे उनमें अपनत्व का भाव उत्पन्न होता है| गाय को दुलारने और गले लगाने से हम स्वयं को प्रकृति के नजदीक पाते हैं एवं एसा महसूस होता है जैसे स्वयं अपनी माता की या प्रकृति की गोद में बेठे हों। सन 2021 से हरियाणा में भी एक एनजीओ द्वारा काउ कडलिंग थेरेपी यानि गौ-स्पर्श चिकित्सा की अवधारणा पेश की गयी है। आधुनिक जीवन की अधिकांश समस्याएँ प्रकृति के साथ असंगति में निहित हैं। हमारे शरीर के विभिन्न मानक जैसे कि हृदय की धड़कन, रक्तचाप और साँसें तनाव के कारण असंगत हैं, जो हम ज़्यादातर समय झेलते हैं। गाय को दुलारना या गले लगाना हमें प्रकृति के करीब लाता है। गाय के शरीर का गर्म तापमान और धीमी और स्थिर साँस हमें ऐसा महसूस कराती है जैसे हम अपनी माँ की गोद में हैं। इस तरह के आराम में कुछ समय बिताने से काफी उपचारात्मक प्रभाव पड़ता है। गाय को दुलारना पश्चिम में। एक नए स्वास्थ्य प्रवृत्ति के रूप में उभर रहा है, लेकिन भारत में में यह प्राचीन काल से दैनिक जीवन का हिस्सा रहा है। वेदिक काल से गाय का जो मनोवैज्ञानिक लाभ भारतीयों को प्राप्त हो रहा था आज विश्व ने भी उसे जान लिया है तथा विश्व के अनेक देशों में काऊ हग थेरेपी का काउ स्पर्श थेरेपी के सेंटर खुल गए हैं जिनसे मानसिक रोगियों का इलाज किया जा रहा है।
ज्योतिषीय महत्व
गाय के ज्पौयोतिषिय महत्रात्णिव कई विद्धवान् अपने अपने मतानुसार बताते हैं एवम बताते हैं कि कथाओं के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में से एक कामधेनु गाय थी। पूर्व-दक्षिण-पूर्व जोन में जमीन पर गाय का प्रतीक लगाने से यह दुःख, मन की परेशानी एवं चिंता को दूर कर सकारात्मक परिणाम देती है। वास्तुशास्त्र फेंगशुई के अनुसार परिवार में सुख-सौभाग्य की बढ़ाने के लिए गाय रखना चाहिए। अपने बछड़े को दूध पिला रही गाय के प्रतीक रूप को घर में स्थापित करने से योग्य संतान की प्राप्ति होती है, माता-पिता और संतान में परस्पर प्रेम बना रहता है। पढ़ाई में एकाग्रता के लिए छात्रों के स्टडी टेबल पर गाय का प्रतीक रखना अच्छे परिणाम देगा, ऐसा करने से सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद बना रहेगा।प्राचीन काल से ही भारत में गोधन को मुख्य धन मानते आए हैं और हर प्रकार से गौरक्षा, गौसेवा एवं गौपालन पर ज़ोर दिया जाता रहा है। हमारे हिन्दू शास्त्रों, वेदों में गौरक्षा, गौ महिमा, गौ पालन आदि के प्रसंग भी अधिकाधिक मिलते हैं। रामायण, महाभारत, भगवद् गीता में भी गाय का किसी न किसी रूप में उल्लेख मिलता है। गाय, भगवान श्री कृष्ण को अतिप्रिय है। गौ पृथ्वी का प्रतीक है। गौमाता में सभी देवी-देवता विद्यमान रहते हैं। सभी वेद भी गौमाता में प्रतिष्ठित हैं। ज्योतिषशास्त्र में गाय का महत्व सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु के साथ-साथ वरुण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी हुई प्रत्येक आहुति गाय के घी से देने की परंपरा है। जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है। यही विशेष ऊर्जा वर्षा का कारण बनती है और वर्षा से ही अन्न, पेड़-पौधों आदि को जीवन प्राप्त होता है। वैतरणी पार करने के लिए गौ दान की प्रथा आज भी हमारे देश में मौजूद है। श्राद्ध कर्म में भी गाय के दूध की खीर का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसी खीर से पितरों को तृप्ति मिलती है। पितर, देवता, मनुष्य सभी को शारीरिक बल गाय के दूध और घी से ही मिलता है।
- ज्योतिष और धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि विवाह जैसे मंगल कार्यों के लिए गोधूलि बेला सर्वोत्तम मुहूर्त होता है, संध्या काल में जब गाय जंगल से घास आदि खाकर आती है तब गाय के खुरों से उड़ने वाली धूल समस्त पापों का नाश करती है।
- नवग्रहों की शांति के लिए भी गाय कि विशेष भूमिका होती है। मंगल के अरिष्ट होने पर लाल रंग की गाय की सेवा और गरीब को गोदान ख़राब मंगल के प्रभाव को क्षीण कर देता है। इसी तरह शनि की दशा, अन्तर्दशा और साढ़ेसाती के समय काली गाय का दान मनुष्यों को कष्टों से मुक्ति दिलाता है।
- बुध ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु गायों को हरा चारा खिलाने से राहत मिलती है।
- पितृदोष होने पर गाय को प्रतिदिन या अमावस्या को रोटी, गुड़, चारा आदि खिलाना चाहिए। गाय की सेवा पूजा से लक्ष्मी जी प्रसन्न होकर भक्तों को मानसिक शांति और सुखमय जीवन होने का वरदान देती है।
-गाय को प्रसन्न करने के लिए हम निम्नउपाय भी कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है की प्रत्येक गाय के भीतर मै स्थित हूँ। यदि हम गौ माता को प्रसन्न कर लेते हैं तो भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करते हैं जिससे हमें शुभ आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पहली रोटी गौ माता के लिए पकाएं व खिलाएं।
- प्रत्येक मांगलिक कार्यों में गौ माता को अवश्य शामिल करें। गाय की पूजा करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं।
- बच्चे अगर आपके कहे को टालते हों तो गौमाता को भोजन उनके हाथ से या हाथ लगवा कर खिलाएं।
- प्रतिदिन, सप्ताह में या महीने में एक बार गौशाला परिवार समेत जाने का नियम बनाएं।
गर्मियों में गौ माता को पानी अवश्य पिलाएं। - - सर्दियों में गौ माता को गुड़ खिलाएं। गर्मियों में गाय को गुड़ न खिलाएं।
- गौ माता के पंचगव्य हजारों रोगों की दवा है, इसके सेवन से असाध्य रोग मिट जाते हैं।
- परिवार में गौ से प्राप्त पंचगव्य युक्त पदार्थों का उपयोग करें, पंचगव्य के बिना पूजा पाठ हवन सफल नहीं होते।
गौ माता जिस जगह खड़ी रहकर आनंदपूर्वक चैन की सांस लेती है। वहां वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं। - गौ माता को चारा खिलाने से तैंतीस कोटी देवी देवताओं को भोग लग जाता है।
- गौ माता कि सेवा परिक्रमा करने से इंसान भय मुक्त हो जाता है व सभी तीर्थो के पुण्यों का लाभ मिलता है।
- गौ माता के गोबर से निर्मित शुद्ध धूप-बत्ती का उपयोग करें। - गौ गोबर के बने उपों से रोजाना घर दूकान मंदिर परिसरों पर धुप करने से वातावरण शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
- घर के दरवाजे पर गाय आये तो उसे खाली न लौटाएं। - गौ माता को कभी पैर न लगाए, गौ माता अन्नपूर्णा देवी कामधेनु है, मनोकामना पूर्ण करने वाली है।
- गौ माता के गले में घंटी जरूर बांधे य गाय के गले में बंधी घंटी बजने से गौ आरती होती है।
- जो व्यक्ति गौ माता की सेवा पूजा करता है उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौ माता हर लेती है।
- गौ माता के दुध मे सुवर्ण तत्व पाया जाता है जो रोगों की क्षमता को कम करता है।
- गौ माता की पीठ पर एक उभरा हुआ कुबड़ होता है। उस कुबड़ में सूर्य केतु नाड़ी होती है। रोजाना सुबह गौ माता की पीठ पर हाथ फेरने से रोगों का नाश होता है।
- तन मन धन से जो मनुष्य गौ सेवा करता है वो वैतरणी गौ माता की पूंछ पकड कर पार करता है। उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती और उन्हें गौ लोकधाम में वास मिलता है।
- जिस व्यक्ति के भाग्य की रेखा सोई हुई हो तो वो व्यक्ति अपनी हथेली में गुड़ को रखकर गौ माता को जीभ से चटाये गौ माता की जीभ हथेली पर रखे गुड़ को चाटने से व्यक्ति की सोई हुई भाग्य रेखा खुल जाती है।
- गाय माता आनंदपूर्वक सासें लेती है छोडती है। वहां से नकारात्मक ऊर्जा भाग जाती है और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है जिससे वातावरण शुद्ध होता है।
- जो धैर्य पूर्वक धर्म के साथ गौ पूजन करता है उनको शत्रु दोषों से छुटकारा मिलता है।
- स्वस्थ गौ माता का गौ मूत्र अर्क को रोजाना दो तोला सेवन करने से सारे रोग मिट जाते हैं।
- गौ माता वात्सल्य भरी निगाहों से जिसे भी देखती है उनके ऊपर गौकृपा हो जाती है।
- कोई भी शुभ कार्य अटका हुआ हो या प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो रहा हो तो गौ माता के कान में कहिये रूका हुआ काम बन जायेगा।
- गौ माता कि सेवा परिक्रमा करने से इंसान भय मुक्त हो जाता है व सभी तीर्थो के पुण्यों का लाभ मिलता है।
- गौ माता के गोबर से निर्मित शुद्ध धूप-बत्ती का उपयोग करें।
- गौ गोबर के बने उपों से रोजाना घर दूकान मंदिर परिसरों पर धुप करने से वातावरण शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
- घर के दरवाजे पर गाय आये तो उसे खाली न लौटाएं।
- गौ माता को कभी पैर न लगाए, गौ माता अन्नपूर्णा देवी कामधेनु है, मनोकामना पूर्ण करने वाली है।
- गौ माता के गले में घंटी जरूर बांधे य गाय के गले में बंधी घंटी बजने से गौ आरती होती है।
- जो व्यक्ति गौ माता की सेवा पूजा करता है उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौ माता हर लेती है।
- गौ माता के दुध मे सुवर्ण तत्व पाया जाता है जो रोगों की क्षमता को कम करता है।
- गौ माता की पीठ पर एक उभरा हुआ कुबड़ होता है। उस कुबड़ में सूर्य केतु नाड़ी होती है। रोजाना सुबह गौ माता की पीठ पर हाथ फेरने से रोगों का नाश होता है।
- तन मन धन से जो मनुष्य गौ सेवा करता है वो वैतरणी गौ माता की पूंछ पकड कर पार करता है। उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती और उन्हें गौ लोकधाम में वास मिलता है।
- जिस व्यक्ति के भाग्य की रेखा सोई हुई हो तो वो व्यक्ति अपनी हथेली में गुड़ को रखकर गौ माता को जीभ से चटाये गौ माता की जीभ हथेली पर रखे गुड़ को चाटने से व्यक्ति की सोई हुई भाग्य रेखा खुल जाती है।
-गाय माता आनंदपूर्वक सासें लेती है छोडती है। वहां से नकारात्मक ऊर्जा भाग जाती है और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है जिससे वातावरण शुद्ध होता है।
- जो धैर्य पूर्वक धर्म के साथ गौ पूजन करता है उनको शत्रु दोषों से छुटकारा मिलता है।
- स्वस्थ गौ माता का गौ मूत्र अर्क को रोजाना दो तोला सेवन करने से सारे रोग मिट जाते हैं।
- गौ माता वात्सल्य भरी निगाहों से जिसे भी देखती है उनके ऊपर गौकृपा हो जाती है।
- कोई भी शुभ कार्य अटका हुआ हो या प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो रहा हो तो गौ माता के कान में कहिये रूका हुआ काम बन जायेगा।
गौवंश संबंधित सरकारी योजनायें
• राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रमएनपीडीडी योजना का उद्देश्य दूध और दूध उत्पादों की गुणवत्ता को बढ़ाना और संगठित दूध खरीद की हिस्सेदारी बढ़ाना है इस योजना के दो घटक हैं
घटक A का उद्देश्य राज्य सहकारी डेयरी संघ / जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ / दूध उत्पादक कंपनियां / किसान उत्पादक संगठनों के लिए गुणवत्तापूर्ण दूध परीक्षण उपकरणों के साथ-साथ प्राथमिक शीतलन सुविधाओं के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना है। यह योजना 2021-22 से 2025 26 तक 5 वर्ष की अवधि के लिए लागू की गई है।
घटक B के अंतर्गत सहकारिता के माध्यम से डेयरी का कार्य किया जाता है। इसमें जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी के साथ वित्तीय सहायता पर हस्ताक्षर हो रखे हैं यह एक बाहरी सहायता प्राप्त परियोजना है। जिसका उद्देश्य गांव में उपज के लिए बाजार संपर्क प्रदान करने और गांव से राज्य स्तर तक हितधारक संस्थानो की क्षमता निर्माण को मजबूत करने के उद्देश्य से आवश्यक डेयरी बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है।
• डेयरी प्रसंस्करण एवं अवसंरचना विकास निधि
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के साथ डेयरी प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचा विकास कोष की स्थापना की गई है। जिसका उद्देश्य पूंजी तनाव ग्रस्त दूध सहकारी समितियां को मुख्य रूप से अपने दशकों पुराने शीतलन और प्रसंस्करण संयंत्र को बदलने और मूल्य वर्धित उत्पादन संयंत्र को जोड़ने के लिए 6:50 परसेंट की सब्सिडी वाले ऋण प्रदान करना है। इस परियोजना घटकों के लिए नाबार्ड से ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है। इस योजना में देश भर के राज्य डेयरी संघ, जिला दुग्ध संघ, दुग्ध उत्पादक कंपनियां, बहु राज्य सहकारी समितियां, और NDDB की सहायक कंपनियों को ऋण सहायता प्रदान करने की परिकल्पना की गई है जिन्हें पात्र अंतिम उधारकर्ता कहा जाता है।
• पशुपालन अवसंरचना विकास निधि
माननीय प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान प्रोत्साहन पैकेज के अंतर्गत 15000 करोड रुपए के पशुपालन अवसंरचना विकास कोष की स्थापना की है। पशुपालन अवसंरचना विकास को व्यक्तिगत उद्यमियों, निजी कंपनियां, किसान उत्पादक संगठन, द्वारा डेयरी प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन अवसंरचना, पशु चारा संयंत्र स्थापित करने के लिए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अनुमोदित किया गया है।
इस योजना का उद्देश्य दूध की क्षमता और उत्पाद विविधीकरण को बढ़ाने में सहायता करना, उत्पादक को बढी हुई कीमत उपलब्ध कराना, घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गुणवत्तापूर्ण दूध उत्पाद उपलब्ध कराना, देश की बढ़ती जनसंख्या की प्रोटीन समृद्ध गुणवत्ता वाले भोजन की आवश्यकताओं को पूरा करने और दुनिया में सबसे अधिक कुपोषित बच्चों की आबादी में से कुपोषण को रोकने के उद्देश्यों को पूरा करना, उद्यमिता का विकास कर रोजगार सृजन करना, निर्यात को बढ़ावा देना, गाय तथा अन्य पशुओं को सस्ती कीमतों पर संतुलित आहार उपलब्ध कराने के लिए गुणवत्तापूर्ण पशु आहार उपलब्ध कराना है|
धार्मिक उल्लेख एवं महत्त्व
सामग्री अपडेट होने तक आपसे क्षमा चाहते हैं, अपडेट के बाद अग्रिम 6 घंटे में आपके पास इस सेक्शन की पठन सामग्री उपलब्ध होगी।धन्यवाद|
ऐतिहासिकउल्लेख एवं महत्त्व
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आर्थिक उल्लेख एवं महत्त्व
वर्तमान समय आर्थिक युग है, जिसमें हर वस्तु उत्पाद को अर्थव्यवस्था में लाभ की कसौटी पर कसा जाता है। पशुपालन उद्योग में गाय केंद्रीय स्थान रखती है। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार भारत प्रतिवर्ष 75 मिलियन से अधिक डेरी फार्म में 160 मिलियन टन दूध का उत्पादन करता है, जिसका बाजार मूल्य लगभग 30 बिलियन डॉलर है। भारतीय संदर्भ में देखे तो गाय को लेकर जितना विवाद होता है उतना शायद ही किसी पशु को लेकर होता है सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गाय के संरक्षण संवर्धन को लेकर जो प्रावधान किए जाते हैं उन्हें कुछ लोगों दद्वारा धार्मिक और वोट बैंक के नजरिए से देखा जाने लगता है। इस विवाद का सबसे दुखद पहलू यह है कि हम गाय के आर्थिक महत्व को भुला देते हैं। जिस दिन हम गाय के अर्थशास्त्र को समझ लेंगे, उस दिन देश में गाय को लेकर शायद ही कोई विवाद होगा। प्राचीन काल से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय से मिलने वाले पांच उत्पाद दूध दही घी गोबर और मूत्र अर्थात पंचगव्य समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में जीवन के विभिन्न अंग रहे हैं। खाने पीने औषधि खेती बाड़ी आदि में पंचगव्य के इस्तेमाल की सुधीर्घ परंपरा रही है। गाय के दूध और घी को तो अमृत समान माना जाता है। भारतीय देसी गाय के अंदर A2 नामक औषधीय तत्व पाया जाता है, जो मोटापा अर्थराइटिस टाइप-1 डायबिटीज, मानसिक तनाव को रोकता है। इसी को देखते हुए विदेशो में विशेष कर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में तो A2 कॉर्पोरेशन नामक संस्था बनाकर भारतीय नस्ल की गायों के दूध को ऊंची कीमत पर बेचा जाता है।। इससे आगे चलकर खेती में खतरनाक कृषि रसायनों का इस्तेमाल बड़ा जिससे समूची खाद्य श्रृंखला प्रदूषित हुई। प्राचीन काल से पंचगव्य का इस्तेमाल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। साहीवाल गाय के दूध में मिलने वाले तीन तत्व पौधों में फंगस विकास को नियंत्रित करके पौधे के विकास को बढ़ावा देते हैं। परंपरागत रूप से भी यह मानना है कि गाय के गोबर में एंटीसेप्टिक, एंटी रेडियोएक्टिव, एंटी थर्मल तत्व पाए जाते हैं। गाय के गोबर के उपले में यह खासियत होती है कि इसके जलाने से तापमान एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ता है इससे खाद्य पदार्थों की पोषक तत्व सुरक्षित बचे रहते हैं। औषधीय गुणो वाले गाय के दूध को महत्वहीन बनाने में श्वेत क्रांति ने खलनायक भूमिका निभाई है, क्योंकि इसके दौरान यूरोपीय नस्ल की गायों को देसी नस्ल की क्रॉस ब्रीडिंग करवाई गई जिससे देसी नस्ल लुप्त होती जा रही है, दूसरी ओर भारतीय मूल की गीर गाय ब्राजील में रिकॉर्ड दूध का उत्पादन कर रही है। इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया में भारतीय नस्ल के ब्राह्मी बैलों का डंका बज रहा है। अब यह दुर्भाग्य ही है कि भारतीय नस्ल की गायों का उन्नत दूध विदेशी पी रहे हैं और विदेशी नस्लों का जहरीला दूध भारतीय पी रहे हैं।गायों से बने उत्पादों का परंपरागत उपयोग तो चल ही रहा है वर्तमान नवीन तकनीकी दुनिया में भी गायों के उत्पादों का नवाचार कर उन्हें आर्थिक महत्व का बनाया जा रहा है। कुछ उदाहरण के द्वारा हम इसे समझते हैं जैसे रोहतक के एक व्यक्ति की नई सोच ने देसी गाय के गोबर से कमाई के नए फार्मूले तैयार किए हैं। जिसने देशी गाय के गोबर से वैदिक प्लास्टर तैयार किया है, जो ऊष्मा रोधी और मौसम के अनुकूल होने के कारण इस वैदिक प्लास्टर की देश के तमाम राज्यों के साथ ही नेपाल में प्रतिमाह 400 टन तक की मांग है। उन्होंने घरों में प्राकृतिक रंग भी तैयार किए हैं। कुछ दिन पहले देसी गाय के गोबर से ईट भी तैयार की है इससे बेहतर परिणाम आए हैं। इस प्रकार उन्होंने पर्यावरण हितेषी मकान भी तैयार कर लिया और लाखों रुपए कमा भी रहे हैं तथा गोधन को आर्थिक महत्व वाला भी बना दिया। इसी प्रकार गाय के गोबर के दुबारा लकड़ी यानि गौकाष्ठ बनाए जाने का व्यवसाय बहुत ही प्रचलन में है। जिससे पर्यावरण हितैषी लकड़ी का निर्माण किया जा रहा है। भारत मवेशियों की संख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान रखता है। परन्तु संख्या के अनुपात मे किसानों का लाभ कम है। पशुपालकों को अधिकतम लाभ दिलाने के लिए बहुत से स्टार्टअप तैयार किये गए है।
हाल ही में केंद्रसरकार ने कामधेनु आयोग का गठन किया है था जो पूरी तरह से गायों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए समर्पित है। कामधेनु आयोग का गठन देश में पशुधन उद्योग के विकास में सुधार के सहज विचार के साथ किया गया था, जिसमें 500 करोड़ रुपये का शुरुआती निवेश और गाय के गोबर और मूत्र से बने स्टार्ट-अप के लिए सरकार की ओर से 60% फंडिंग शामिल है। राष्ट्रीय कामधेनु आयोग भारत में गाय आधारित उत्पाद स्टार्ट-अप शुरू करने के लिए अधिक युवाओं को प्रोत्साहित कर रहा है। निम्नानुसार नवीन स्टार्ट-अप शुरू किये जा सकते है।
1. देसी गायों का प्रजनन और पालन
देसी गायों के पालन से किसानों को आर्थिक लाभ और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। देशी गायों की नस्लों के कूबड़ में एक विशेष नस होती है जिसे सूर्य केतु नाड़ी कहते हैं जो सूर्य और चंद्रमा से ऊर्जा को अवशोषित करती है। देसी गाय के उत्पादों और उप-उत्पादों में औषधीय लाभ होने की बात कही जाती है।
देशी गायें, प्रचलित नस्लों की तुलना में अधिक वर्षों तक लगातार अच्छा दूध देती हैं। देशी नस्ल के दूध में सबसे अच्छा बीटा कैसिइन प्रोटीन, बी 2, बी3, ए विटामिन, 22 घुलनशील खनिज, अमीनो एसिड आदि होते हैं जो इसके प्रोटीन को पचाने में आसान बनाते हैं। यह उपलब्ध सबसे अच्छे प्राकृतिक एंटी-ऑक्सीडेंट में से एक है। A2 दूध की वसा पचने योग्य होती है, जबकि A1 दूध पचने योग्य नहीं होता है और इसे स्किम्ड करने की आवश्यकता होती है। उच्च दरों पर देसी गाय के दूध की बिक्री निश्चित रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अधिक पैसा लाएगी।
3. उर्वरक और कीट निरोधक
देशी गायों के गोबर और गोमूत्र से बने खाद और कीट विकर्षक जैविक खेती के लिए खाद के रूप में अधिक उपयुक्त हैं, क्योंकि उनमें अधिक लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं और केंचुए उन पर पनपते हैं। इस प्रकार, किसान कीटनाशक और खाद खरीदने से बचते हैं। कृपया अपने शहरी उद्यानों में रासायनिक खादों के बजाय इनका उपयोग करें। यह मिट्टी के लिए स्वास्थ्यवर्धक है और निश्चित रूप से अधिक टिकाऊ है। पंचगव्य, अमृत जल जैसे खाद और जीवामृत जैसे कीट विकर्षक आदि पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। 4. बायोगैस इकाइयों की स्थापना और बिक्री
जैव-निम्नीकरणीय अपशिष्ट को ऊर्जा में परिवर्तित करने में सहायता के लिए बायोगैस इकाइयां स्थापित करना, ताकि हम रसोईघरों में प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम कर सकें।
5. गौमूत्र आसवन संयंत्र और आसुत गौमूत्र उत्पादों की स्थापना और बिक्री।
गोमूत्र आसवन संयंत्र स्थापित करना जिससे मूत्र एकत्र करने और आसवन में मदद मिल सके जिसका उपयोग उर्वरक और कीट निरोधक बनाने के लिए किया जा सके। यह पौधों के लिए उपलब्ध सबसे प्राकृतिक जैव-कीटनाशक और जैव उर्वरक है। गोमूत्र के छिड़काव से फंगल संक्रमण, कीटों के हमले के साथ-साथ नेमाटोड जैसे परजीवी भी नष्ट हो जाते हैं। बेहतर परिणामों के लिए गोमूत्र को नीम के तेल और सेंवई के साथ मिलाया जा सकता है। 15% सांद्रता पर गोमूत्र पर किए गए एक शोध अध्ययन से पता चलता है कि मेथी और भिंडी जैसे सब्जी के पौधों में फंगल रोगजनकों जैसे कि फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम, राइजोक्टोनिया सोलानी और स्केलेरोटियम रोल्फ्सि में दमन हुआ था, जो डैंपिंग ऑफ और विल्टिंग से जुड़े थे। आसुत गोमूत्र का सेवन करने पर यह हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता 6. गोबर के बर्तन और गोबर के लट्टे, धूप और अगरबत्ती
गोबर के बर्तन प्लास्टिक के बर्तनों के लिए एक बेहतरीन टिकाऊ विकल्प हैं और यह कचरे से बचने का सबसे अच्छा प्रोजेक्ट है और गोबर की लकड़ियाँ लकड़ी की जगह ले सकती हैं। ये बर्तन आदर्श उपहार हैं और गाय के गोबर की लकड़ियाँ हवन, श्मशान और अलाव में इस्तेमाल की जा सकती हैं। गाय के गोबर और कुछ हवन सामग्री से बने धूप और अगरबत्ती घर के वातावरण को शुद्ध कर सकते हैं।
5. गौमूत्र आसवन संयंत्र और आसुत गौमूत्र उत्पादों की स्थापना और बिक्री।
गोमूत्र आसवन संयंत्र स्थापित करना जिससे मूत्र एकत्र करने और आसवन में मदद मिल सके जिसका उपयोग उर्वरक और कीट निरोधक बनाने के लिए किया जा सके। यह पौधों के लिए उपलब्ध सबसे प्राकृतिक जैव-कीटनाशक और जैव उर्वरक है। गोमूत्र के छिड़काव से फंगल संक्रमण, कीटों के हमले के साथ-साथ नेमाटोड जैसे परजीवी भी नष्ट हो जाते हैं। बेहतर परिणामों के लिए गोमूत्र को नीम के तेल और सेंवई के साथ मिलाया जा सकता है। 15% सांद्रता पर गोमूत्र पर किए गए एक शोध अध्ययन से पता चलता है कि मेथी और भिंडी जैसे सब्जी के पौधों में फंगल रोगजनकों जैसे कि फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम, राइजोक्टोनिया सोलानी और स्केलेरोटियम रोल्फ्सि में दमन हुआ था, जो डैंपिंग ऑफ और विल्टिंग से जुड़े थे। आसुत गोमूत्र का सेवन करने पर यह हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता 6. गोबर के बर्तन और गोबर के लट्टे, धूप और अगरबत्ती
गोबर के बर्तन प्लास्टिक के बर्तनों के लिए एक बेहतरीन टिकाऊ विकल्प हैं और यह कचरे से बचने का सबसे अच्छा प्रोजेक्ट है और गोबर की लकड़ियाँ लकड़ी की जगह ले सकती हैं। ये बर्तन आदर्श उपहार हैं और गाय के गोबर की लकड़ियाँ हवन, श्मशान और अलाव में इस्तेमाल की जा सकती हैं। गाय के गोबर और कुछ हवन सामग्री से बने धूप और अगरबत्ती घर के वातावरण को शुद्ध कर सकते हैं। पहुंच बढ़ाने, खेत पर पशुओं की बीमारी का निदान करने के लिए उपकरण विकसित करने जैसे मास्टिटिस के शुरुआती लक्षणों का पता लगाने के लिए स्वचालित निगरानी प्रणाली पर नज़र रख सकते हैं। कुछ ऐप डेयरी किसानों को खेत पर उपलब्ध चारे का वास्तविक समय विश्लेषण भी प्रदान कर सकते हैं ताकि इसकी सामग्री को समझा जा सके। इससे किसानों को आहार में सुधार करने और चारे की दक्षता में सुधार करने में मदद मिल सकती है। 8. त्वचा देखभाल उत्पाद
स्किन केयर उत्पाद उद्योग के लिए अपार अवसर हैं क्योंकि यह उद्योग पहले से ही उपभोक्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय है, क्योंकि ये उत्पाद प्राकृतिक, रासायनिक रूप से निष्क्रिय और त्वचा पर इस्तेमाल किए जाने पर गैर विषैले होते हैं। दूध आधारित, गोबर आधारित और मूत्र आधारित त्वचा देखभाल उत्पाद उपलब्ध हैं। इसका श्रेय दूध प्रोटीन और फॉर्मूले में मौजूद समृद्ध अमीनो एसिड को जाता है, जो संवेदनशील त्वचा को परेशान नहीं करेंगे। गाय आधारित उत्पादों के साथ पहले से ही काम कर रहे कुछ स्टार्टअप जैसे काउपैथी साबुन, टूथपेस्ट, फ्लोर क्लीनर, हेयर ऑयल, धूपबत्ती, शेविंग क्रीम और फेस वॉश बनाते हैं। काउपैथी का कहना है कि साबुन में सूखा और चूर्णित गाय का गोबर, संतरे के छिलके, लैवेंडर पाउडर और आंवले होते हैं और उनके टूथपेस्ट में गोबर, घी और मूत्र होता है। 9. विशेष औषधियाँ
गाय के गोबर और मूत्र के अर्क से बनी विभिन्न संयोजनों की विशेष औषधियाँ गाय के उत्पादों पर आधारित एक संभावित उद्योग हो सकती हैं। पंचगव्य एक विशेष औषधि है जिसे आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने कथित तौर पर उत्पादन के लिए हाथ मिलाया है।
चिकित्सीय उल्लेख एवं महत्त्व
गाय के चिकित्सकीय महत्व के बारे में आचार्यों ने गौ विज्ञान का विकास किया। गाय के दूध से विशेष ऊर्जा शक्ति और बुद्धि मिलती है । पंचगव्य या गाय चिकित्सा पवित्र वेदों में वर्णित उपचार का एक समग्र दृष्टिकोण है। पंचगव्य का अर्थ है गायों से प्राप्त पांच मुख्य पदार्थ जिनमें दूध, दही, घी, मुत्र, गोबर शामिल हैं। इन्हें सेवन करने बाहरी रूप से लगाने पर उनके उपचारात्मक गुणों का पता चलता है तथा ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। आयुर्वेद में पंचगव्य उपचार को काउपेथी कहा जाता है, पंचगव्य के द्वारा बहुत सी बीमारियों का इलाज बिना किसी दुष्प्रभाव के किया जा सकता है। पंचगव्य के प्रत्येक उत्पाद में मानव स्वास्थ्य को उत्तम बनाने हेतु अलग अलग घटक होते हैं। प्रत्येक गव्य विभिन्न रोगों के प्रति अलग अलग प्रभाव रखता है। प्रत्येक गव्य का उपयोग एकल चिकित्सा पद्धति के रूप में अथवा अन्य के संयोजन के साथ किया जाता है। पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर के रोगनिरोधक क्षमता को बढाकर रोगों को दूर किया जाता है। गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है। दही एवं घी के पोषण मान की उच्चता से सभी परिचित हैं। दूध का प्रयोग विभिन्न प्रकार से भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से होता आ रहा है। घी का प्रयोग शरीर की क्षमता को बढ़ाने एवं मानसिक विकास के लिए किया जाता है। दही में सुपाच्य प्रोटीन एवं लाभकारी जीवाणु होते हैं जो क्षुधा को बढ़ाने में सहायता करते हैं। पंचगव्य का निर्माण देसी मुक्त वन विचरण करने वाली गायों से प्राप्त उत्पादों द्वारा ही करना चाहिए।पंचगव्य निर्माण
सूर्य नाड़ी वाली गायें ही पंचगव्य के निर्माण के लिए उपयुक्त होती हैं। देसी गायें इसी श्रेणी में आती हैं। इनके उत्पादों में मानव के लिए जरूरी सभी तत्त्व पाये जाते हैं। महर्षि चरक के अनुसार गोमूत्र कटु तीक्ष्ण एवं कषाय होता है। इसके गुणों में उष्णता, राष्युकता, अग्निदीपक प्रमुख हैं। गोमूत्र में नाइट्रोजन, सल्फुर, अमोनिया, कॉपर, लौह तत्त्व, यूरिक एसिड, यूरिया, फास्फेट, सोडियम, पोटेसियम, मैंगनीज, कार्बोलिक एसिड, कैल्सिअम, नमक, विटामिन बी, ऐ, डी, ई; एंजाइम, लैक्टोज मुख्य रूप से पाये जाते हैं। यूरिया कीटाणु नाशक है। पोटैसियम क्षुधावर्धक, रक्तचाप नियामक है। सोडियम द्रव मात्रा एवं तंत्रिका शक्ति का नियमन करता है। मैग्नीशियम एवं कैल्सियम हृदयगति का नियमन करते हैं। दही जो कि लेक्टोबेसिलस जीवाणु के द्वारा किण्वित होता है वह महत्वपूर्ण प्रोबायोटिक्स है। दही में कई पोषक तत्व और सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं जिनमें पानी प्रोटीन विटामिन खनीज लवण सम्मिलित है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है। रक्त शोधन करता है। बालो की गुणवत्ता को बढ़ाता है, मोटापे को घटाता है। गाय के गोबर मे कई लाभकारी सूक्ष्मजीव जैसे एक्रोमाईसीज, एल एक्टौबेसिलस, सी एडिडा आदि प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसमे खनीज लवण, विटामिन, पोटेशियम नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, सेल्यूलोज, हेमिसेल्यूलोज, म्यूकस, लिग्निन सहित विभिन्न पोषक तत्व होते है। कचरा निपटान में गाय के गोबर का उपयोग होता है। गाय के गोबर में एंटीसेप्टिक और एंटी-फंगस प्रभाव भी पाए गए है। यह त्वचा के रोगो (सोरायसिस, एग्जिमा) में कारगर है। नीम के पते और गाय के गोबर-का मिश्रण फोडे, फुसी को ठीक करता है। गाय का घी बहुत सी आयुर्वेदिक दवाइयों को विलय करने हेतु सर्वोतम उत्पाद है। जैसे त्वचा रोगों के इलाज हेतु शतधौत घृत घाव भरने के लिए भल्लातकदि घृत आदि । देसी गाय के दूध में निर्मित घी में आवश्यक फैटी एसिड (ओमेगा 3 और ओमेगा 9), विटामिन (A, D, E, K) का समृद्ध स्त्रोत है। घी में विभिन्न औषधीय गुण विभिन्न बीमारियों जैसे त्वचा विकार, पाचन विकार, एंटी अस्थमा, पक्षाघात में लाभप्रद होता है।
गौमूत्र गाय से निकलने वाला एक गैर विषेला तरल अपशिष्ट है। CSIR और भारत के अन्य वैज्ञानिको ने गोमूत्र आसवन के, एंटीसेप्टिक, एंटी-फंगस, प्रभाव का प्रदर्शन कर गौमूत्र के औषधीय प्रभाव की महत्ता स्थापित की। यह नेफ्रोप्रोटेक्टिव एजेंट के रूप में कार्य करता है। यह वजन घटाने, पाचन संबंधी समस्या, एडिमा, विभिन्न हदय और गुर्दे की बीमारियों के खिलाफ उलट प्रभाव में मदद करता है। आयुर्वेद के अनुसार देसी गाय का "गौमूत्र" एक संजीवनी है। गौ मूत्र एक अमृत के समान है जो दीर्घ जीवन प्रदान करता है, पुनर्जीवन देता है, रोगों को दूर रखता है, रोग प्रतिकारक शक्ति एवं शरीर की माँसपेशियों को मज़बूत करता है आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर में तीनों दोषों का संतुलन भी बनाता है और कीटनाशक की तरह भी काम करता है। गौमूत्र का उपयोग
1. संसाधित किया हुआ गोमूत्र अधिक प्रभावकारी; प्रतिजैविक, रोगाणु रोधक (antiseptic), ज्वरनाशी (antipyretic), कवकरोधी (antifungal) और प्रतिजीवाणु (antibacterial) बन जाता है।
2. यह एक जैविक टॉनिक के समान है। यह शरीर-प्रणाली में औषधि के समान काम करता है।
3. यह अन्य औषधियों के साथ, उनके प्रभाव को बढ़ाने के लिए भी ग्रहण किया जा सकता है। गोमूत्र कैंसर के उपचार के लिए भी एक बहुत अच्छी औषधि है। यह शरीर में 'सेल डिवीज़न इन्हिबिटरी एक्टिविटी' को बढ़ाता है और कैंसर के मरीज़ों के लिए बहुत लाभदायक है। आयुर्वेद के ग्रंथों के अनुसार गौ-मूत्र विभिन्न जड़ी-बूटियों से परिपूर्ण है। यह आयुर्वेदिक औषधि गुर्दे, श्वसन और हृदय सम्बन्धी रोग, संक्रामक रोग और संधिशोथ (Arthritis), इत्यादि कई व्याधियों से मुक्ति दिलाता है।
4. आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार गौ-मूत्र विभिन्न जड़ी-बूटियों से परिपूर्ण है। यह आयुर्वेदिक औषधि गुर्दे, श्वसन और हृदय सम्बन्धी रोग, संक्रामक रोग (infections) और संधिशोथ (Arthritis), इत्यादि कई व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। गाय के दूध का उपयोग इसके स्वास्थ्य सुरक्षा, स्वास्थ्य प्रचार और चिकित्सकीय प्रभावो की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए किया जाता है। गायो की भारतीय नस्ल A2 प्रकार तथा विदेशी नस्ल A1 प्रकार का दूध देती है। A1 प्रकार के दूध में B कैसीमोर्फेन (BCM-7) होता है, जो कि स्तनपान कराने वाले शिशुओ मे आटिज्म और मधुमेह का कारण बन सकता है। जबकि A2 प्रकार का दूध जो कि भारतीय देशी गाय द्वारा उत्पादित होता है वह पौष्टिक सुपाच्य होता है। गाय का दूध स्तन के दूध के विकल्प के रूप में शिशुओ के लिए उत्तम है। यह दातों हड्डियो के विकास के लिए, एनिमिया दूर करने में लाभकारी है।
गाय का घी के फायदे
1500 ईसा पूर्व से ही घृत या घी, जैसा कि हम आम तौर पर इसे कहते हैं, भारतीय संस्कृति में अत्यधिक पूजनीय रहा है। गाय के घी के अनगिनत स्वास्थ्य लाभ हैं। सरल शब्दों में कहें तो घृत एक आयुर्वेदिक औषधि है जो हर्बल गाय के घी का रूप लेती है। एंटीऑक्सीडेंट का एक प्राकृतिक स्रोत, गाय का घी फ्री रेडिकल्स से छुटकारा दिलाता है और ऑक्सीकरण को रोकता है। आयुर्वेद में गाय के घी के लाभों को बहुत से स्रोतों में बताया गया है। इसके अतिरिक्त, वे सुबह खाली पेट सबसे पहले घी लेने की सलाह देते हैं। गाय का घी रस की तरह काम करता है और इसमें कई तरह की बीमारियों का इलाज करने की शक्ति होती है क्योंकि यह शरीर की सभी कोशिकाओं के लिए पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
पाचन शक्ति में सुधार करता है
शुद्ध देसी घी को निस्संदेह ऐसे व्यक्ति के आहार का हिस्सा होना चाहिए जिसकी पाचन क्षमता थोड़ी कमज़ोर है। पित्त और अग्नि एक दूसरे के पूरक हैं। जो चीजें आपकी पाचन अग्नि को कम करती हैं, वे आपके पित्त को संतुलित करती हैं। हालाँकि, घी एक अपवाद है क्योंकि यह पित्त दोष को संतुलित करता है और पाचन तंत्र को मज़बूत बनाता है।
मधुमेह के स्तर को बनाए रखता है
किसी भी खाद्य पदार्थ का ग्लाइसेमिक एसिड इस बात से निर्धारित होता है कि खाने के बाद यह हमारे रक्त शर्करा के स्तर को कितनी तेज़ी से बढ़ाता है। अन्य खाना पकाने वाले तेलों के बजाय घी का उपयोग करके, भोजन के ग्लाइसेमिक इंडेक्स को कम करके रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है। त्वचा के लिए
शुद्ध देसी घी को आयुर्वेद द्वारा प्राकृतिक मॉइस्चराइज़र के रूप में मान्यता दी गई है। यह शरीर को अंदर से बाहर तक हाइड्रेट और पोषण देता है। रात में दूध के साथ घी का सेवन करने से त्वचा की चमक में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
बालों के लिए
घी की तेल जैसी चिपचिपाहट बालों में नमी बनाए रखने में मदद करती है। गाय के घी में मौजूद विटामिन ई और विटामिन ए बालों को डिटॉक्स करने और कंडिशनिंग में भी मदद करता है। घी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट की उच्च सांद्रता बालों की मजबूती बढ़ाने और बालों का झड़ना कम करने में भी मदद करती है।